बिहार बोर्ड कक्षा 11 रसायन विज्ञान अध्याय 6 उष्मगतिकी दीर्घ उतरीय प्रश्न
दीर्घ उतरीय प्रश्न
प्रश्न:1 ऊष्मागतिकी क्या है? ऊष्मागतिकी के शून्यांकी नियम की व्याख्या कीजिये तथा इसके महत्व पर प्रकाश डालिये?
उत्तर: ऊष्मागतिकी भौतिकी की वह शाखा है जिसमें ताप व ऊष्मा की अभिधारणाओं (Concepts) एवं ऊष्मीय ऊर्जा (Thermal Energy) का अन्य ऊर्जाओं में तथा अन्य ऊर्जाओं के ऊष्मीय ऊर्जा में रूपान्तरण का अध्ययन किया जाता है। ऊष्मागतिकी, ऊष्मा तथा यांत्रिक कार्य के पारस्परिक सम्बन्ध का भी वर्णन करती है l
शून्यांकी नियम ऊष्मागतिकी को मूलभूत सिद्धान्त है एवं ताप को परिभाषित करता है। इसके अनुसार यदि दो निकाय A व B अलगअलग तीसरे निकाय से साथ तापीय संतुलन में हैं तो A तथा B निकाय भी आपस में तापीय संतुलन में होंगे।
प्रश्न:2 एक निकाय की ऊष्मा, कार्य व आन्तरिक ऊर्जा की व्याख्या कीजिये।
उत्तर: ऊष्मा (Heat)— यह दो निकायों के मध्य स्थानान्तरित होने वाली ऊर्जा है। जब किन्हीं दो निकायों के बीच ऊर्जा स्थानान्तरण निकायों के बीच तापान्तर के कारण होता है तो स्थानान्तरित होने वाली ऊर्जा को ऊष्मा (Heat) कहते हैं। दो निकायों के मध्य ऊष्मा का प्रवाह उच्च ताप से निम्न ताप की ओर होता है।
कार्य (Work)— यह भी दो निकायों के मध्य स्थानान्तरित होने वाली ऊर्जा है। जब किन्हीं दो निकायों के बीच ऊर्जा का स्थानान्तरण उनके तापान्तर पर निर्भर नहीं करता है तो उनके बीच स्थानान्तरित होने वाली ऊर्जा को कार्य कहते हैं।
आन्तरिक ऊर्जा (Internal Energy)— जब किसी तंत्र (निकाय) को ऊष्मा दी जाती है तो उसके कुछ भाग का उपयोग निकाय द्वारा परिवेश के विरुद्ध कार्य करने में होता है बाकी ऊष्मा से निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में वृद्धि होती है। निकाय के अणुओं से सम्बद्ध ऊर्जा को आन्तरिक ऊर्जा कहा गया है। आन्तरिक ऊर्जा निकाय के अणुओं की स्थितिज तथा गतिज ऊर्जाओं के योग के बराबर होती है।
प्रश्न:3 ऊष्मागतिकीय निकाय, ऊष्मागतिकीय चर राशियाँ व ऊष्मागतिकीय प्रक्रम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: ऊष्मागतिकीय निकाय- सामान्यतया हम किसी वस्तु अथवा वस्तुओं के समूह को अन्य भागों से पृथक् कर उनमें परिवर्तन का अध्ययन करते हैं । इस वस्तु अथवा वस्तुओं के समूह को निकाय कहा जाता है एवं निकाय को जिस भाग से पृथक् किया गया है, उस भाग को परिवेश कहते हैं।
ऊष्मागतिकीय चर राशियाँ- हम जानते हैं कि ऊष्मागतिकीय निकाय, स्थूल निकाय होते हैं। इनका अध्ययन स्थूल गुणों दाब (P), आयतन (V), ताप (T) आदि के आधार पर किया जाता हैं। दाब, आयतन तथा ताप को अवस्था चर के नाम से जाना जाता है। अर्थात् किसी भी निकाय की अवस्था को (P, V, T) चरों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
ऊष्मागतिकीय प्रक्रम- जब किसी ऊष्मागतिकीय निकाय के ऊष्मागतिकीय चरों में परिवर्तन कर उस निकाय में परिवर्तन किया जाता है तो इसे ऊष्मागतिकीय प्रक्रम, कहा जाता है। कुछ महत्त्वपूर्ण ऊष्मागतिकीय प्रक्रमों के नाम अग्रानुसार
प्रश्न:4 ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम की व्याख्या कीजिये।
उत्तर: ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम- ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम ऊर्जा संरक्षण का नियम है। इसके अनुसार न तो ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है और न ही नष्ट की जा सकती है। जब किसी तंत्र को ΔQ ऊष्मा दी जाती है तो उसका कुछ भाग वायुमण्डलीय दाब के विपरीत कार्य ΔW करता है। जिसके कारण आयतन में वृद्धि होती है और शेष भाग गैस के ताप में वृद्धि करता है। ताप में वृद्धि होने के कारण आन्तरिक ऊर्जा में वृद्धि (dμ) होती है। अतः ऊर्जा के संरक्षण के नियमानुसार
ΔQ= dU + ΔW
अतः तंत्र को दी गई ऊष्मा (ΔQ), उसके आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन (dU) तथा उस पर किये गये कार्य (ΔW) के योग के बराबर होता है।”
प्रश्न:5 मेयर के सम्बन्ध की व्युत्पत्ति कीजिये।
उत्तर: ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम से
ΔQ= dU + ΔW ………. (1)
यदि एक निकाय में किसी आदर्श गैस के ॥ मोल, P दाब, V आयतन तथा T ताप पर लेकर विचार करें तो समआयतनिक परिवर्तनों के लिए,
dU = μCvΔT
समदाबीय परिवर्तनों के लिए, ΔQ = μCpΔT
एवं कार्य को सूत्र, ΔW = μRΔT
ये सभी मान समीकरण (1) में स्थापित करने पर
μCpΔT = μCvΔT + μRΔT
या Cp – Cv = R
इसी समीकरण को मेयर का सम्बन्ध कहा जाता है। इसके अनुसार किसी गैस की दोनों मोलर विशिष्ट ऊष्माओं (Cp तथा Cv) को अन्तर गैस नियतांक (R) के समान होता है।
प्रश्न:6 उत्क्रमणीय व अनुक्रमणीय इंजन में अन्तर स्पष्ट कीजिये?
उत्तर: उत्क्रमणीय प्रक्रम- वह प्रक्रम जिसमें सभी प्रक्रियायें उत्क्रमणीय हों।
अनुक्रमणीय प्रक्रम- वह प्रक्रम जिसमें कम से कम एक प्रक्रिया अनुक्रमणीय हो।
उत्क्रमणीय इंजन- वह इंजन जो उत्क्रमणीय प्रक्रम के अनुसार कार्य करे।
अनुक्रमणीय इंजन- वह इंजन जो अनुत्क्रमणीय प्रक्रम के अनुसार कार्य करे।
प्रश्न:7 समतापी व रुद्धोष्म प्रक्रम में अन्तर स्पष्ट करते हुये उक्त प्रक्रमों में किये गये कार्य की गणना कीजिये।
उत्तर: समतापीय प्रक्रम
नियत ताप पर किसी गैस के दाब एवं आयतन में परिवर्तन किया। जाये तो यह समतापी प्रक्रम कहलाता है। इस प्रक्रम के लिये निम्न आवश्यक प्रतिबंध होते हैं
1. प्रक्रम धीमी गति से किया जाना चाहिए जिससे कि निकाय को आवश्यकता अनुसार, परिवेश से ऊष्मा के आदान-प्रदान के लिये समय उपलब्ध हो सके।
2.पात्र की दीवारें पूर्ण रूप से सुचालक होनी चाहिए जिससे कि परिवेश के साथ, प्रभावी ऊष्मीय सम्पर्क में रह सके।
प्रश्न:8 ऊष्मागतिकी के विभिन्न प्रक्रमों व उनमें किये गये कार्य की व्याख्या कीजिये।
उत्तर: विभिन्न ऊष
जब किसी ऊष्मागतिकीय निकाय के ऊष्मागतिकीय चरों में परिवर्तन के कारण उस निकाय की अवस्था में परिवर्तन होता है तो इसे । ऊष्मागतिकीय प्रक्रम कहते हैं। नीचे कुछ महत्त्वपूर्ण ऊष्मागतिकीय प्रक्रम दिये जा रहे हैं—
1. समतापीय प्रक्रम
2. रुद्धोष्म प्रक्रम
3. सम आयतनिक प्रक्रम
4. समदाबी प्रक्रम
5. चक्रीय प्रक्रम
प्रश्न:9 किसी निकाय की अवस्था से क्या तात्पर्य है ?समझाइए।
उत्तर: किसी ऊष्मागतिकी निकाय का वर्णन उसके दाब (P), आयतन (V), ताप (T) तथा निकाय के संघटन से किया जाता है। इन गुणों को निकाय में परिवर्तन से पहले तथा परिवर्तन के पश्चात् ज्ञात करते हैं। निकाय के लिए दाब, आयतन, ताप तथा मात्रा मापन योग्य (स्थूल गुण) हैं। किसी गैस की अवस्था का वर्णन उसके दाब, आयतन, ताप तथा मात्रा (n) से कर सकते हैं। दाब आयतन तथा ताप को अवस्था फलन कहते हैं क्योंकि इनका मान निकाय की अवस्था पर निर्भर करता है न कि इसके पहुँचने के तरीके पर किसी निकाय की अवस्था को परिभाषित करने के लिए निकाय के सभी गुणों की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि कुछ गुण ही स्वतंत्र रूप में परिवर्तित हो सकते हैं । इन गुणों की संख्या निकाय की प्रकृति पर निर्भर करती है। जब किसी निकाय के लिए P V, T तथा n का मान निश्चित हो जाता है तो इसे निकाय की एक अवस्था कहते हैं अर्थात् इन गुणों में परिवर्तन से निकाय की अवस्था परिवर्तित हो जाती है।
प्रश्न:10 चक्रीय प्रक्रम क्या है?
उत्तर: चक्रीय प्रक्रम :- ऊष्मा गतिकी में वह प्रक्रम जिसमें निकाय विभिन्न परिवर्तनों से गुजरता हुआ पुनः अपनी प्रारंभिक अवस्था में लौट आता है। चक्रीय प्रक्रम कहलाता है। चक्रीय प्रक्रम में निकाय की आंतरिक ऊर्जा में कोई परिवर्तन नहीं होता है। अर्थात्
dU = 0
ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम से
dQ = dU+PdV
dQ = PdV = dW
अतः चक्रीय प्रक्रम में अवशोषित संपूर्ण ऊष्मा निकाय के द्वारा किए गए कार्य के बराबर होती है।
प्रश्न:11 ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम क्या है?
उत्तर: ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम :- इस नियम के अनुसार निम्न कथन है।
केल्विन प्लांक कथन :- इस कथन के अनुसार कोई भी ऐसा ऊष्मा इंजन बनाना संभव नहीं है। जिसमें कार्यकारी पदार्थ द्वारा उच्च ताप पर अवशोषित ऊष्मा को संपूर्ण रूप से कार्य में परिवर्तित कर दे।
क्लासियस का कथन :- इस कथन के अनुसार है कार्यकारी पदार्थ निम्न ताप वाली वस्तु से ऊष्मा लेकर उच्च ताप वाली वस्तु की ओर ऊष्मा का स्थानांतरण संभव नहीं है। जब तक कि कार्यकारी पदार्थ पर बाह्य कार्य संभव ना हो।
प्रश्न:12 ऊष्मा गतिकी प्रक्रम के प्रकार बताइये l
उत्तर: ऊष्मा गतिकी प्रक्रम के प्रकार :- ऊष्मागतिकी प्रक्रम के निम्न प्रकार हैं।
समतापी प्रक्रम :- किसी ऊष्मा गतिकी निकाय में ऐसा परिवर्तन जिसमें निकाय के दाब व आयतन परिवर्तित होते हैं। जब तक ताप स्थिर रहता है। इसे समतापी प्रक्रम कहते हैं।
समतापी प्रक्रम संपन्न होने के लिए आवश्यक है कि परिवेश व निकाय के बीच ऊष्मा स्थानांतरण हो अर्थात निकाय की दीवारें चालक होनी चाहिए।
समदाबीय प्रक्रम :- ऊष्मागतिकी निकाय के भौतिकी प्रक्रम में ताप व आयतन परिवर्तित हो तथा दाब नियत हो तो इस प्रक्रम को समदाबीय प्रक्रम कहते हैं।
किसी पदार्थ की अवस्था परिवर्तन के दौरान दाब नियत रहता है। जैसे – पानी का जमना।
रुद्धोष्म प्रक्रम :- ऐसा प्रक्रम जिसमें ताप दाब का आयतन तीनों परिवर्तित होते हैं। मगर परिवेश तथा निकाय के बीच ऊष्मा का आदान-प्रदान नहीं होता है। रुद्धोष्म प्रक्रम कहलाता है।
इस प्रक्रम के संपन्न होने के लिए निकाय पूर्णता कुचालक पदार्थ की दीवारों से बने एक गैस पात्र में गैस का प्रसार करते हैं। जिसमें गैस की आंतरिक ऊर्जा में कमी होती है। क्योंकि परिवेश से किसी प्रकार की उसमें प्रवेश नहीं करती है। और गैस का ताप कम हो जाता है।
प्रश्न:13 आंतरिक ऊर्जा से संबंधित तथ्यों को स्पष्ट करिये l
उत्तर: आंतरिक ऊर्जा से संबंधित कुछ तथ्य :- आंतरिक ऊर्जा से संबंधित निम्न तथ्य है।
किसी निकाय की आंतरिक ऊर्जा निकाय की प्रारंभिक व अंतिम स्थितियों पर निर्भर करती है ना कि उन अवस्थाओं के बीच पथ पर आंतरिक उर्जा निकाय की अवस्था फलन है।
आंतरिक ऊर्जा ताप पर निर्भर करती है।
पदार्थ की मात्रा पर निर्भर करता है।
यदि निकाय विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए अपनी प्रारंभिक अवस्था में आ जाती है तो उसकी आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन शून्य होगा।
आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन का मान धनात्मक या ऋणात्मक हो सकता है। यदि निकाय ऊर्जा का अवशोषण करती है। तब आंतरिक उर्जा धनात्मक तथा निकाय से बाहर निकलती है तो आंतरिक ऊर्जा ऋण आत्मक होती है।
प्रश्न:14 ऊष्मा गतिकी का प्रथम नियम क्या है?
उत्तर: ऊष्मा गतिकी का प्रथम नियम
ऊष्मा गतिकी के प्रथम नियम को ऊर्जा सरक्षण का नियम भी कहते है ।इसके अनुसार ऊर्जा का ना तो उत्त्तपन किया जा सकता है न ही नष्ट किया जा सकता हैं बल्कि ऊर्जा का एक रूप से दूसरे रूप में रूपांतरण किया जा सकता है।
इसे हम इस प्रकार भी कह सकते है की किसी भी तंत्र की कुल ऊर्जा स्थिर होती है।ऊर्जा के एक रूप को दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है।
ऊष्मा गतिकी के प्रथम नियम से कुछ निस्कर्ष सामने आए।
ब्रह्माण्ड की कुल ऊर्जा निश्चित होती है लेकिन ऊर्जा का रूपांतरण संभव है। ऐसी गति मशीन बनाना संभव नहीं है जिस पर बिना ऊर्जा के कार्य प्राप्त हो सके।
प्रश्न:15 निकाय कितने प्रकार के है? व्याख्या कीजिये l
उत्तर: निकाय के प्रकार
अब हम द्रव्य एवं ऊर्जा के संचरण के आधार पर निकाय को वर्गीकृत करते हैं–
1. खुला निकाय:
एक खुले निकाय में ऊर्जा एवं द्रव्य–दोनों का निकाय एवं परिवेश के मध्य विनिमय हो सकता है।
उदाहरणार्थ–अभिकारक एक खुले बीकर में लिये जाएँ।
2. बंद निकाय:
बंद निकाय में निकाय एवं परिवेश के मध्य द्रव्य का विनिमय संभव नहीं है, परंतु ऊर्जा का विनिमय हो सकता है। जैसे– अभिकारक बंद बीकर में लिये जाएँ।
3. विलगित निकाय:
एक विलगित निकाय में निकाय एवं परिवेश के मध्य द्रव्य एवं ऊर्जा– दोनों का ही विनिमय संभव नहीं होता है। उदाहरणार्थ– अभिकारक एक थर्मस फ्लास्क में लिये जाएँ।
प्रश्न:16 हेस का नियम का उल्लेख करें।
उत्तर: हेस का नियम है कि “यदि कोई रासायनिक परिवर्तन दो या दो से अधिक विधियों से एक या एक से अधिक पदो में हो तो सम्पूर्ण परिवर्तन में उत्पन्न या अवशोषित ऊर्जा की मात्रा समान होती है। परिवर्तन चाहे किसी भी विधि द्वारा किया गया है।” उदाहरण के लिए जब कार्बन से कार्बन डाईऑक्साइड को बनाया जाता है तो दो विधियाँ इस्तेमाल किया जाती है। हेस का ऊष्मा योग का नियम महत्वपूर्ण है क्योंकि यह रासायनिक रूप से ऊर्जा के संरक्षण और ऊष्मप्रवैगिकी के नियमों को प्रदर्शित करता है।
प्रश्न:17 स्वतः प्रवर्तित प्रक्रम क्या होती हैं ? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर: स्वतः उत्सर्जन वह प्रक्रम है जिसमें कोई क्वान्टमयांत्रिक प्रणाली (परमाणु, अणु या परमाणु के भीतर के कण) किसी उत्तेजित अवस्था से कम ऊर्जा की अवस्था में लौटते हैं तथा इस क्रिया में फोटॉन उत्सर्जित करते हैं। हमारे आसपास जो अधिकांश प्रकाश है, वह स्वतः उत्सर्जन से ही निकली हुई है। यदि परमाणु या अणु को ऊष्मा के बजाय किसी अन्य विधि द्वारा उत्तेजित किया जाता है तो इसे संदीप्ति कहा जाता है।
प्रश्न:18 गिब्स मुक्त ऊर्जा क्या है?
उत्तर: ऊष्मागतिकी में, गिब्स मुक्त ऊर्जा (Gibbs free energy) एक ऊष्मागतिक विभव है जिसका उपयोग किसी निकाय द्वारा नियत ताप और दाब पर किए जाने वाले अधिकतम व्युत्क्रमणीय कार्य की गणना के लिए किया जा सकता है। गिब्स की मुक्त ऊर्जा गैर-प्रसारात्मक कार्य की वह अधिकतम मात्रा है जो ऊष्मागतिक रूप से बन्द निकाय से लिया जा सकता है।
कार्य की अधिकतम मात्रा तभी प्राप्त की जा सकती है जब प्रक्रम पूर्णतः व्युत्क्रमणीय हो। जब कोई निकाय एक आरम्भिक प्रावस्था (स्टेट) से अन्तिम प्रावस्था में व्युत्क्रमणीय परिवर्तित होता है, तो गिब्स की मुक्त ऊर्जा में होने वाली कमी, निकाय द्वारा अपने चारों ओर के वातावरण (surroundings) पर किए गए कार्य तथा दाब-बलों द्वारा किए गए कार्य के अन्तर के बराबर होती है।
प्रश्न:19 ऊष्मागतिकी क्या है?
उत्तर: ऊष्मागतिकी, भौतिक विज्ञान की वह शाखा है “जिसके अंतर्गत ऊष्मीय ऊर्जा, कार्य एवं इनके पारस्परिक रूपांतरण का अध्ययन किया जाता है। तो इसे ऊष्मागतिकी कहते हैं।” तथा वर्तमान में ऊष्मागतिकी के क्षेत्र में व्यापक वृद्धि हुई है। अतः ऊष्मागतिकी का क्षेत्र यान्त्रिक ऊर्जा अथवा कार्य तक सीमित नहीं है। अपितु ऊर्जा के विभिन्न रूप हैं। जैसे- रासायनिक ऊर्जा, विद्युत् ऊर्जा एवं चुंबकीय ऊर्जा तक विस्तृत है।
प्रश्न:20 ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम का क्या महत्व है?
उत्तर: दूसरा नियम महत्वपूर्ण है क्योंकि ऊष्मा का कार्य में रूपांतरण प्रौद्योगिकी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है । अध्याय ऊष्मा इंजनों का वर्णन करता है। ऊष्मा को कार्य में परिवर्तित करने के लिए कार्नाट चक्र सबसे कुशल प्रकार की चक्रीय प्रक्रिया है।
प्रश्न:21 'किसी वस्तु में अधिक ऊष्मा होती है'- क्या यह सही कथन है? नहीं तो क्यों ?
उत्तर: 1. सममात्रा नहीं है। उष्मा विकिरण में ऊर्जा उच्च ताप तथ्य से कुछ ताप वस्तु तक प्रवाहित होती है।
2. एक बार गर्म करने की प्रक्रिया बंद हो जाने के बाद हम धमा शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते। उष्मा में कनेक्शन है लेकिन शरीर में आर्काइव ऊर्जा नहीं है। किसी वस्तु में अधिक थर्मल होना गलत है, तथ्य का गर्म होना उचित होगा।
प्रश्न:22 ऊष्मीय विस्तार क्या है?
उत्तर: 1. तापमान में परिवर्तन के कारण पदार्थों के आकार, क्षेत्र और आयतन में परिवर्तन की प्रवृत्ति को तापीय विस्तार कहते हैं।
2. गर्म होने पर पदार्थों की तीन अवस्थाएं (ठोस, तरल और गैस) फैलती हैं। जब किसी ठोस को गर्म किया जाता है, तो उसके परमाणु अपने बिंदु बिंदुओं के परितः उच्च आयामों से कंपनियां करते हैं। ठोस के आकार में आपका परिवर्तन कम होता है।
प्रश्न:23 उत्क्रमणीय और अनुत्क्रमणीय नामांकन का क्या अर्थ है?
उत्तर: प्रतिवर्ती प्रक्रिया:
1.एक उष्मागतिक प्रक्रिया को उत्क्रमणीय तभी जा सकता है जब विपरीत दिशा में पथ को इस तरह से पुन: अनुरक्षित करना संभव हो कि माना जाता है कि प्रणाली और सहमति प्रारंभिक, प्रत्यक्ष प्रक्रिया के समान राज्यों से ला गुजरे।
उदाहरण:गैस का एक अर्धस्थैतिक समतापीय विस्तार, धीमी गति और बसंत का विस्तार।
प्रक्रिया प्रक्रिया: सभी प्राकृतिक प्रक्रियाएँ हैं।
2.शटर प्रक्रिया को पीवी ट्रिगर में जोखिम नहीं हो सकता है, क्योंकि इन प्रक्रियाओं में प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में दबाव, तापमान के अनूठे मान नहीं हो सकते हैं।
प्रश्न:24 एंट्रापी के संदर्भ में ऊष्मप्रवैगिकी के दूसरे नियम का उल्लेख करें।
उत्तर: प्रकृति में होने वाली सभी प्रथाएँ (अपरिवर्तनीय प्रक्रिया) के लिए एन्ट्रापी हमेशा बढ़ती रहती है। प्रतिवर्ती प्रक्रिया के लिए एंट्रॉपी नहीं बदलती"।
2. अंट्रापी उस दिशा को निर्धारित करती है जिसमें प्राकृतिक प्रक्रिया होने वाली है।
प्रश्न:25 एसीटोन के मूल्यांकन की एन्थैल्पी पानी की तुलना में कम होती है। क्यों?
उत्तर: एसीटोन में बॉन्ड की कमी होती है, इसलिए इंटरमॉलिक लैमिनी कमजोर होती हैं, जिससे यह तेजी से उपनेता / वाष्पित हो जाता है, जिससे आशंका की मोलर एन्थैल्पी कम हो जाती है। इसके अलावा, क्योंकि एसीटोन में पोलर ओएच बांड की कमी होती है, इसमें कम एंथेल्पी होता है। पानी में एक गैर-ध्रुवीय क्षेत्र और एक मजबूत संबंध दोनों होते हैं।